"कहाँ तो तय था चरागा हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए
यहाँ दरख्तों के साए में धूप लगती है
लो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए"
दुष्यंत जी की इन पंक्तियों को मैंने अपनी आँखों से चरितार्थ होते देखा है। मिट्टी की सुगंध और उसका रंग लिए जिस पर हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी है, अगर वही हमारे लिए दुःख का कारण बन जाए तो हम अपनी फ़रियाद लेकर कहाँ जाएं... एक किस्सा प्रस्तुत करना चाहूँगा - "एक बार भगवान् श्रीराम जी के पैरों के नीचे एक गिलहरी दब गई... उसे बेहद कष्ट हुआ लेकिन उसने उफ़ भी नहीं की... बाद मेंश्रीराम की नज़र उस पर पड़ी और उन्होंने गिलहरी से पूछा - जब तुम्हें इतना कष्ट हुआ तो तुमने मुझसे कहा क्यों नहीं? गिलहरी ने उत्तर दिया - प्रभु! जब भी मुझे कुछ कष्ट होता था तो मैं "राम" का नाम लेती थी, आज तो मुझे स्वयं "राम" ने कष्ट दिया, तब मैं किसका नाम लेती?"
दुष्यंत जी की इन पंक्तियों को मैंने अपनी आँखों से चरितार्थ होते देखा है। मिट्टी की सुगंध और उसका रंग लिए जिस पर हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी है, अगर वही हमारे लिए दुःख का कारण बन जाए तो हम अपनी फ़रियाद लेकर कहाँ जाएं... एक किस्सा प्रस्तुत करना चाहूँगा - "एक बार भगवान् श्रीराम जी के पैरों के नीचे एक गिलहरी दब गई... उसे बेहद कष्ट हुआ लेकिन उसने उफ़ भी नहीं की... बाद मेंश्रीराम की नज़र उस पर पड़ी और उन्होंने गिलहरी से पूछा - जब तुम्हें इतना कष्ट हुआ तो तुमने मुझसे कहा क्यों नहीं? गिलहरी ने उत्तर दिया - प्रभु! जब भी मुझे कुछ कष्ट होता था तो मैं "राम" का नाम लेती थी, आज तो मुझे स्वयं "राम" ने कष्ट दिया, तब मैं किसका नाम लेती?"
नन्ही—सी गिलहरी ने जानवर होकर भी अपने को संस्कारवान होने का परिचय दे दिया, और एक हम है जो इंसान होकर भी इंसानियत को तार—तार करने से बाज नहीं आते।
ऐसी ही कुछ अपेक्षाएं हम अपने शासन में बैठे अधिकारियों से करते है कि वे अपने अधिकारों का दुरूपयोग कदापि न करें, हर उस शख्स के भाव को भलीभांति समझे, उसकी बात को सुने, उसे नजरअंदाज नहीं करे। अक्सर देखने में आया है कि कुछ अधिकारी अपने आप को भगवान समझने की भूल कर बैठते है।
मैं ऐसे अधिकारियों से नफरत करता हूं जो किसी के प्रभाव में आकर अपने पद का दुरूपयोग करने से गुरेज नहीं करते। कभी—कभी तो ऐसा लगता है, शायद उनका जमीर मर गया है या उन्होने जयचन्दो के यहां अपना जमीर गिरवी रख दिया है। संस्कारवान परिवार से होते जरूर है, मगर कहीं न कहीं उनके संस्कारों में मिलावट की बू तब आने लग जाती है, जब वे स्वभाव के जरिए अपने चरित्र का चित्रण महसूस करा देते है।
ऐसे निम्न स्तर की सोच रखने वाले अधिकारियों और हर उस व्यक्ति के लिए जिनशिशु प्रज्ञा श्रीजी म.सा. द्वारा कहे गए प्रवचन की एक लाईन का उल्लेख करना चाहूंगा कि 'लोग सांप से डरते है...पाप से नहीं' कितनी बडी बात है...आज का इंसान धन के लालच में इस तरह से अंधा हो गया है कि उसे अच्छा क्या है.....? बुरा क्या है....? पाप क्या है.... और पुण्य क्या है...? इसकी समझ नहीं रही है। वह भुल जाते है कि गलत तरीके से कमाये हुए धन का एक ढेला भी घर में आना अनैतिक आचरण को बढावा देता है। अक्सर लोग भूल जाते हैं कि उनके कर्मों को परमात्मा देख रहा है और सारा हिसाब—किताब भी यहीं चुकाना पड़ता है। मेरी ऐसे सभी अधिकारियों और राग—द्वेष रखने वाली आत्माओं से गुज़ारिश है कि वे समय रहते अपने चरित्र में परिवर्तन लाएं, जिससे उनका जनम कम से कम किसी न किसी के लिए तो सार्थक बन जाए।
याद रहे किसी पर उंगली उठाना तो आसान है, लेकिन उन्हें यह भी नहीं भूलना चाहिए की शेष उंगलियां उन्हीं की तरफ ईशारा करती हैं, जिनमें अंगुष्ठ भी शामिल होता है।
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