Tuesday, August 20, 2013

रक्षाबंधन

रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं

आधुनिक युग में फिर से कृष्ण की जरुरत

राकेश सोनी
+91-94627-79697

किसी भी देश की संस्कृति वहां की आध्यात्मिक विचार-धाराओं से ही जन्म लेती है। सभी त्योहारों एवं पर्वों के पीछे कोई न कोई पुरातन-धार्मिक प्रेरणा जरुर होती है। रक्षाबंधन का आधुनिक स्वरूप भी हिन्दू धार्मिक परम्पराओं व प्राच्य वैदिक विज्ञान से ही आया है।
आज 20 अगस्त 2013 को फिर रक्षा-बंधन का पर्व समूचे देश में हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है, इस पुरातन धार्मिक परम्परा पर मैं भी अपनी और से दो शब्द प्रस्तुत कर रहा हूं, मुझे उम्मीद है कि आप भी मेरे उक्त विचारों से सहमत होंगे 
हम आज के बदलते परिवेश में रिश्तों के मायने भूलते जा रहे हैं। पाश्चात् संस्कृति के प्रभाव से ग्रसित होकर वास्तविक रिश्तों की बलि चढ़ा रहे है, बहिन के लिए भाई क्या होता है और भाई के लिए ​बहिन क्या होती है, ऐसा प्रतीत होता है कि यह मान-मर्यादाएं अब सिर्फ किताबों, ग्रंथों या यूं कहें महाभारत काल के उस स्वर्णिम युग तक ही सीमित रह गए हैं शायद, आधुनिकता की अंधी दौड़ में आध्यात्म कहीं खो गया है, वर्ना एक जमाना वो था जब भगवान श्री कृष्ण जैसे धर्म भाई द्रौपदी जैसी बेबस अबलाओं की लाज बचाने सहज ही उपस्थित हो जाया करते थे, किंतु आज के  इस युग में ऐसा कोई भाई नज़र नहीं आता है, जो द्रौपदी की  पुकार सुने और रक्षा के लिए आगे आ जाए।
राखी के नाम से प्रचलित रक्षा-बंधन का यह पर्व प्रतिवर्ष हमें हमारी संकृति की याद दिलाकर पवित्र रिश्ते को कालांतर तक ऐसे ही निभाते रहने की सीख देता है।आओ आज इस पावन अवसर पर यही संकल्प ले, कि- हर हाल में हम अपनी बहन की  रक्षा  करेगें 

                          रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं 

Sunday, August 18, 2013

निम्न स्तर की सोच...!!!

"कहाँ तो तय था चरागा हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए
यहाँ दरख्तों के साए में धूप लगती है
लो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए" 

दुष्यंत जी की इन पंक्तियों को मैंने अपनी आँखों से चरितार्थ होते देखा है। मिट्टी की सुगंध और उसका रंग लिए जिस पर हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी है, अगर वही हमारे लिए दुःख का कारण बन जाए तो हम अपनी फ़रियाद लेकर कहाँ जाएं... एक किस्सा प्रस्तुत करना चाहूँगा - "एक बार भगवान् श्रीराम जी के पैरों के नीचे एक गिलहरी दब गई... उसे बेहद कष्ट हुआ लेकिन उसने उफ़ भी नहीं की... बाद मेंश्रीराम की नज़र उस पर पड़ी और उन्होंने गिलहरी से पूछा - जब तुम्हें इतना कष्ट हुआ तो तुमने मुझसे कहा क्यों नहीं? गिलहरी ने उत्तर दिया - प्रभु! जब भी मुझे कुछ कष्ट होता था तो मैं "राम" का नाम लेती थी, आज तो मुझे स्वयं "राम" ने कष्ट दिया, तब मैं किसका नाम लेती?" 


नन्ही—सी गिलहरी ने जानवर होकर भी अपने को संस्कारवान होने का परिचय दे दिया, और एक हम है जो इंसान होकर भी इंसानियत को तार—तार करने से बाज न​हीं आते।

ऐसी ही कुछ अपेक्षाएं हम अपने शासन में बैठे अधिकारियों से करते है कि वे अपने अधिका​रों का दुरूपयोग कदापि न करें, हर उस शख्स के भाव को भलीभांति समझे, उसकी बात को सुने, उसे नजरअंदाज नहीं करे। अक्सर देखने में आया है कि कुछ अधिकारी अपने आप को भगवान समझने की भूल कर बैठते है।

मैं ऐसे अधिकारियों से नफरत करता हूं जो किसी के प्रभाव में आकर अपने पद का दुरूपयोग करने से गुरेज नहीं करते। कभी—कभी तो ऐसा लगता है, शायद उनका जमीर मर गया है या उन्होने जयचन्दो के यहां अपना जमीर गिरवी रख दिया है। संस्कारवान परिवार से होते जरूर है, मगर कहीं न कहीं उनके संस्कारों में मिलावट की बू तब आने लग जाती है, जब वे स्वभाव के जरिए अपने चरित्र का चित्रण महसूस करा देते है।

ऐसे निम्न स्तर की सोच रखने वाले अधिकारियों और हर उस व्यक्ति के लिए जिनशिशु प्रज्ञा श्रीजी म.सा. द्वारा कहे गए प्रवचन की एक लाईन का उल्लेख करना चाहूंगा कि 'लोग सांप से डरते है...पाप से नहीं' कितनी बडी बात है...आज का इंसान धन के लालच में इस तरह से अंधा हो गया है कि उसे अच्छा क्या है.....? बुरा क्या ​है....? पाप क्या ​है.... और पुण्य क्या है...? इसकी समझ नहीं रही है। वह भुल जाते है कि गलत तरीके से कमाये हुए धन का एक ढेला भी घर में आना अनैतिक आचरण को बढावा देता है। अक्सर लोग भूल जाते हैं कि उनके कर्मों को परमात्मा देख रहा है और सारा हिसाब—किताब भी यहीं चुकाना पड़ता है। मेरी ऐसे सभी अधिकारियों और राग—द्वेष रखने वाली आत्माओं से गुज़ारिश है कि वे समय रहते अपने चरित्र में परिवर्तन लाएं, जिससे उनका जनम कम से कम किसी न किसी के लिए तो सार्थक बन जाए।

याद रहे किसी पर उंगली उठाना तो आसान है, लेकिन उन्हें यह भी नहीं भूलना चाहिए की शेष उंगलियां उन्हीं की तरफ ईशारा करती हैं, जिनमें अंगुष्ठ भी शामिल होता है।